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बीस साल बाद — जब सच ने सब कुछ छीन लिया

20 साल की सजा के बाद जब राघव को पता चला कि उसकी पत्नी जिंदा है, तो उसकी पूरी दुनिया बदल गई।



बारिश की वह रात आज भी राघव को याद थी।

बीस साल पहले उसी रात उसकी जिंदगी अचानक रुक गई थी।

उसकी पत्नी नंदिनी के गायब होने के बाद घर में मिली परिस्थितियों के आधार पर राघव को ही उसकी हत्या का दोषी माना गया। अदालत में परिस्थितिजन्य सबूत उसके खिलाफ थे। राघव बार-बार कहता रहा—

“मैंने नंदिनी को नहीं मारा... वह कहीं चली गई है। वह जिंदा है।”

लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं मानी।

उसे लंबी सजा हुई और राघव जेल चला गया।

पहले कुछ साल वह हर मुलाकात के दिन अपनी मां का इंतजार करता रहा। मां बूढ़ी थीं, फिर एक दिन उनका आना बंद हो गया।

बहन की शादी हो गई और वह दूसरे शहर चली गई।

दोस्त धीरे-धीरे दूर होते गए।

और राघव के पास बचा सिर्फ एक नाम—नंदिनी।

वह हर रात जेल की छोटी-सी खिड़की से आसमान देखता और सोचता—

“अगर वह सच में जिंदा है, तो एक दिन जरूर लौटेगी।”

बीस साल गुजर गए।

राघव के बाल सफेद हो चुके थे। चेहरे की चमक खत्म हो चुकी थी। लेकिन उसके मन में एक छोटी-सी उम्मीद अब भी जिंदा थी।

फिर एक दिन जेल में उससे मिलने उसका पुराना दोस्त अमित आया।

अमित काफी देर तक चुप बैठा रहा।

राघव ने पूछा, “क्या हुआ? तू इतना परेशान क्यों है?”

अमित ने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा—

“राघव... मुझे नहीं पता यह बात तुझे बतानी चाहिए या नहीं।”

“क्या बात है?”

अमित ने जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

राघव ने तस्वीर हाथ में ली।

उसकी उंगलियां कांपने लगीं।

तस्वीर में नंदिनी थी।

वह जिंदा थी।

और उसके साथ एक आदमी और दो बच्चे खड़े थे।

राघव कुछ सेकंड तक तस्वीर को देखता रहा।

फिर उसके होंठों से सिर्फ इतना निकला—

“ये... नंदिनी है?”

अमित ने सिर झुका दिया।

“हाँ।”

राघव की आंखों में आंसू आ गए।

बीस साल तक जिस इंसान के लिए उसने जेल की दीवारों के बीच जिंदगी गुजार दी, वह कहीं और अपनी जिंदगी जी रही थी।

अमित ने बताया कि उसे नंदिनी के बारे में कुछ समय पहले पता चला था। उसने नया नाम अपना लिया था और दूसरे शहर में किसी और के साथ रह रही थी।

राघव ने कोई गुस्सा नहीं किया।

बस तस्वीर को देखते हुए पूछा—

“क्या उसने कभी मेरे बारे में पूछा?”

अमित चुप रहा।

उस चुप्पी में राघव को अपना जवाब मिल गया।

कुछ समय बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई और राघव जेल से बाहर आ गया।

लेकिन बाहर की दुनिया उसे पहचान नहीं पाई।

जिस घर को वह अपना घर कहता था, वह बिक चुका था।

मां नहीं थीं।

पुराने दोस्त अपने-अपने परिवारों में व्यस्त थे।

जिस मोहल्ले में वह कभी सम्मान से रहता था, वहां अब नए लोग रहते थे।

उसके पास न नौकरी थी, न बचत, न परिवार।

जेल से निकलते समय उसके हाथ में सिर्फ एक छोटा-सा बैग था।

उसने आसमान की तरफ देखा।

बीस साल पहले वह जेल गया था एक पति बनकर।

आज बाहर आया तो उसके पास पति कहलाने के लिए पत्नी नहीं थी।

बेटा कहलाने के लिए मां नहीं थी।

और दोस्त कहलाने के लिए पुराने दोस्त भी बहुत कम बचे थे।

कुछ दिनों बाद राघव ने नंदिनी को देखने का फैसला किया।

वह उस शहर में पहुंचा जहां नंदिनी रहती थी।

दूर से उसने उसे देखा।

नंदिनी एक घर के बाहर खड़ी थी।

उसके बालों में सफेदी आ चुकी थी।

राघव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

नंदिनी ने उसे देखा तो उसके चेहरे का रंग बदल गया।

दोनों बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।

आखिर राघव ने धीमी आवाज में पूछा—

“तुम जिंदा थीं... फिर मुझे क्यों नहीं बताया?”

नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए।

लेकिन राघव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

“मुझे सफाई नहीं चाहिए।”

वह कुछ पल रुका।

“मैं सिर्फ यह जानना चाहता था कि क्या कभी तुम्हें याद आया कि कोई आदमी तुम्हारे लिए बीस साल जेल में रहा था?”

नंदिनी के पास कोई जवाब नहीं था।

राघव वापस मुड़ गया।

उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

सड़क पर चलते हुए उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

लेकिन इस बार वह नंदिनी के लिए नहीं रो रहा था।

वह उन बीस सालों के लिए रो रहा था जो कभी वापस नहीं आने वाले थे।

कुछ महीने बाद राघव ने शहर छोड़ दिया।

एक छोटे से कस्बे में उसने किताबों की दुकान शुरू की।

दुकान बहुत बड़ी नहीं थी।

एक दिन एक बच्चा दुकान में आया और बोला—

“अंकल, सबसे अच्छी कहानी वाली किताब कौन-सी है?”

राघव मुस्कुराया।

उसने बच्चे को एक किताब देते हुए कहा—

“वह कहानी पढ़ना जिसमें इंसान अपना सब कुछ खोकर भी जीना सीखता है।”

बच्चे ने पूछा—

“क्या वह सच्ची कहानी है?”

राघव कुछ पल चुप रहा।

फिर मुस्कुराकर बोला—

“शायद... क्योंकि कुछ कहानियां किताबों में नहीं, इंसान की जिंदगी में लिखी जाती हैं।”

उस दिन पहली बार राघव को लगा कि उसकी जिंदगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

बीस साल उससे छीन लिए गए थे।

लेकिन बाकी जिंदगी अभी उसके हाथ में थी।

और उसने तय किया—

अब वह अपने बीते हुए कल को सजा नहीं देगा।

वह आगे जिएगा।

अपने लिए।

क्योंकि कभी-कभी जिंदगी हमें इंसाफ नहीं देती...

लेकिन फिर भी हमें अपने बचे हुए दिनों को जीना पड़ता है।

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