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बिहार का शापित घर

बिहार के राजगीर में सस्ते दाम पर खरीदा गया एक पुराना घर, लेकिन उस घर में छिपा था एक रहस्यमय शाप। सुस्मिता अचानक उस घर की कैद में फंस जाती है।

अगर कभी आपको किसी अनजान जगह पर बहुत सस्ते दाम में कोई खूबसूरत घर मिल जाए, तो उसे खरीदने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी जरूर लेना।

क्योंकि हर सस्ता घर किस्मत का तोहफा नहीं होता।

कभी-कभी कुछ घर अपने अंदर ऐसी कहानियां छिपाकर रखते हैं, जिन्हें सुनकर इंसान की रातों की नींद उड़ जाती है।

आज मैं आपको बिहार के राजगीर, नालंदा जिले के पास की एक ऐसी ही कहानी सुनाने जा रहा हूं।

यह कहानी है किशोर और सुस्मिता की।

दोनों की शादी को लगभग तीन साल हो चुके थे।

किशोर पटना में एक निजी कंपनी में नौकरी करता था और सुस्मिता घर संभालती थी। दोनों का सपना था कि शहर की भीड़भाड़ से दूर अपना एक छोटा-सा घर हो, जहां वे शांति से रह सकें।

काफी समय से वे घर तलाश रहे थे।

लेकिन बिहार के शहरों में जमीन और मकान की कीमत देखकर दोनों का बजट बार-बार बिगड़ जाता था।

एक दिन किशोर के एक परिचित ने उसे बताया,

"राजगीर से थोड़ा बाहर एक पुराना मकान बिक रहा है। घर काफी बड़ा है और कीमत भी बहुत कम है।"

किशोर ने तुरंत पूछा,

"इतना सस्ता क्यों?"

उस आदमी ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

"बस... मालिक को जल्दी बेचकर बाहर जाना है।"

किशोर ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

अगले रविवार वह सुस्मिता के साथ मकान देखने पहुंच गया।

घर देखकर दोनों हैरान रह गए।

दो मंजिल का पुराना लेकिन खूबसूरत मकान था। सामने बड़ा-सा आंगन, पीछे आम और जामुन के पेड़ और घर के चारों तरफ काफी खुली जगह।

घर पुराना जरूर था, लेकिन मजबूत था।

सुस्मिता ने धीरे से कहा,

"किशोर, अगर ये सच में इतनी कम कीमत में मिल रहा है, तो हमें ले लेना चाहिए।"

किशोर मुस्कुराया।

"मुझे भी यही लग रहा है।"

लेकिन तभी एक बुजुर्ग पड़ोसी उनके पास आए।

उन्होंने किशोर को देखते हुए पूछा,

"बेटा, तुम लोग यह घर खरीदने आए हो?"

"जी।"

बुजुर्ग कुछ देर घर की तरफ देखते रहे।

फिर बोले,

"मेरी बात मानो तो इस घर के बारे में थोड़ा और पता कर लेना।"

किशोर ने पूछा,

"क्यों? कोई परेशानी है?"

बुजुर्ग ने सीधे जवाब नहीं दिया।

उन्होंने बस इतना कहा,

"कुछ घर खाली नहीं होते, चाहे उनमें कोई दिखाई न दे।"

किशोर को उनकी बात अजीब लगी।

लेकिन उसने उसे बुजुर्ग की वहम समझकर नजरअंदाज कर दिया।

कुछ दिनों बाद कागजी कार्रवाई पूरी हुई और मकान किशोर के नाम हो गया।

किशोर के माता-पिता भी इस बात से खुश थे।

उसकी मां ने कहा,

"बेटा, नया घर है। गृह प्रवेश अच्छे से करना। पंडित जी से शुभ मुहूर्त निकलवा लेना।"

किशोर ने हामी भर दी।

गृह प्रवेश के दिन पूरा परिवार घर में इकट्ठा हुआ।

सास-ससुर, किशोर के छोटे भाई और कुछ रिश्तेदार भी आए।

पूजा के दौरान सब कुछ सामान्य था।

लेकिन पूजा खत्म होने के बाद सुस्मिता अचानक घर की ऊपरी मंजिल की तरफ देखने लगी।

किशोर ने पूछा,

"क्या हुआ?"

सुस्मिता ने कहा,

"कुछ नहीं... मुझे लगा जैसे ऊपर किसी ने मेरा नाम पुकारा।"

किशोर हंस पड़ा।

"शायद बाहर से किसी की आवाज आई होगी।"

सुस्मिता ने भी बात को वहीं छोड़ दिया।

उस रात सभी लोग नए घर में सो गए।

आधी रात के करीब सुस्मिता की आंख खुली।

कमरे में हल्की-सी ठंड थी।

उसने देखा कि खिड़की बंद थी।

फिर भी कमरे के पर्दे धीरे-धीरे हिल रहे थे।

सुस्मिता ने किशोर को जगाया।

"किशोर..."

किशोर ने नींद में पूछा,

"क्या हुआ?"

"पर्दा देखो।"

किशोर ने आंखें खोलीं।

कुछ सेकंड तक पर्दे को देखा।

फिर बोला,

"हवा होगी।"

"लेकिन खिड़की बंद है।"

किशोर उठकर खिड़की के पास गया।

खिड़की सच में अंदर से बंद थी।

उसने पर्दा हटाया।

बाहर अंधेरा था।

तभी ऊपर से धीमी आवाज आई।

जैसे किसी ने लकड़ी के फर्श पर धीरे-धीरे कदम रखा हो।

टक...

टक...

टक...

सुस्मिता डर गई।

किशोर ने कहा,

"ऊपर कोई नहीं है। शायद पुराना घर है, लकड़ी सिकुड़ती-फैलती होगी।"

लेकिन उस रात दोनों ठीक से सो नहीं पाए।

अगले दिन से सुस्मिता को घर में कुछ अजीब महसूस होने लगा।

कभी उसे लगता कोई उसके पीछे खड़ा है।

कभी उसे अपने कान के पास किसी के फुसफुसाने की आवाज सुनाई देती।

लेकिन जब वह पीछे मुड़ती, तो वहां कोई नहीं होता।

एक शाम वह रसोई में चाय बना रही थी।

तभी उसे साफ आवाज सुनाई दी,

"सुस्मिता..."

उसका हाथ रुक गया।

आवाज घर की ऊपरी मंजिल से आई थी।

सुस्मिता धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ बढ़ी।

ऊपर पहुंचकर उसने देखा कि एक पुराना कमरा खुला हुआ था।

जबकि उस कमरे को हमेशा बंद रखा गया था।

अंदर धूल से भरा सामान पड़ा था।

एक पुराना संदूक, कुछ लकड़ी के सामान और दीवार पर एक बड़ा-सा पुराना आईना।

सुस्मिता आईने के सामने जाकर खड़ी हुई।

कुछ पल तक वह खुद को देखती रही।

फिर उसे लगा जैसे आईने में उसके पीछे कोई खड़ा है।

उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

कोई नहीं था।

वह फिर आईने की तरफ मुड़ी।

इस बार आईना सामान्य था।

सुस्मिता डरकर नीचे भाग आई।

किशोर ने उसे देखा तो पूछा,

"क्या हुआ?"

सुस्मिता ने सारी बात बता दी।

किशोर ने ऊपर जाकर कमरा देखा।

लेकिन वहां कुछ भी असामान्य नहीं था।

उसने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

उस रात सुस्मिता ने कहा,

"मुझे इस घर में कुछ ठीक नहीं लग रहा।"

किशोर ने उसका हाथ पकड़कर कहा,

"अगर तुम्हें डर लग रहा है तो हम कुछ दिनों के लिए मां-पिताजी के पास चलेंगे। लेकिन मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।"

अगले कुछ दिनों तक सब शांत रहा।

फिर एक रात अचानक सुस्मिता बदल गई।

वह बिस्तर पर बैठी खिड़की की तरफ देख रही थी।

किशोर ने पूछा,

"क्या देख रही हो?"

सुस्मिता ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने बस धीरे से कहा,

"मुझे वहां जाना है।"

"कहां?"

"ऊपर वाले कमरे में।"

किशोर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"अभी रात के दो बजे हैं। सुबह चलेंगे।"

लेकिन सुस्मिता ने पहली बार उसकी तरफ ऐसी नजरों से देखा, जिन्हें देखकर किशोर खुद घबरा गया।

उसकी आवाज बहुत धीमी थी।

"वो मुझे बुला रही है।"

किशोर ने पूछा,

"कौन?"

सुस्मिता ने ऊपर की तरफ देखा।

"इस घर की मालकिन।"

किशोर कुछ समझ नहीं पाया।

लेकिन सुस्मिता उठकर सीढ़ियों की ओर चलने लगी।

किशोर उसके पीछे गया।

ऊपर पहुंचते ही पुराना कमरा अपने आप खुल गया।

सुस्मिता अंदर चली गई।

किशोर ने उसे रोकने की कोशिश की।

तभी कमरे का दरवाजा अचानक बंद हो गया।

किशोर ने दरवाजा खोलने की कोशिश की।

"सुस्मिता!"

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

कुछ सेकंड बाद सुस्मिता की आवाज आई।

"किशोर... मुझे यहां से बाहर निकालो।"

किशोर घबरा गया।

उसने पूरी ताकत से दरवाजा खोला।

दरवाजा खुल गया।

लेकिन सुस्मिता कमरे के बीचोंबीच खड़ी थी।

उसकी आंखें बंद थीं।

किशोर उसके पास गया।

"सुस्मिता!"

उसने आंखें खोलीं।

लेकिन कुछ पल तक उसे पहचान नहीं पाई।

फिर अचानक सामान्य होकर बोली,

"हम यहां क्यों आए हैं?"

किशोर का चेहरा सफेद पड़ गया।

अगली सुबह उसने अपने माता-पिता को सब कुछ बताया।

उसकी मां ने कहा,

"बेटा, इसे हल्के में मत लेना। किसी अच्छे पंडित जी से बात करो।"

किशोर के पिता ने भी कहा,

"घर चाहे कितना भी सस्ता क्यों न मिला हो, इंसान की शांति से ज्यादा कीमती कुछ नहीं।"

परिवार ने किशोर और सुस्मिता का साथ देने का फैसला किया।

किशोर उसी दिन पास के एक प्रसिद्ध पंडित के पास गया।

पंडित जी का नाम था पंडित हरिनारायण झा।

उन्होंने किशोर की पूरी बात ध्यान से सुनी।

फिर पूछा,

"क्या घर खरीदने से पहले आपने पुराने मालिक से इतिहास पूछा था?"

किशोर ने सिर हिलाया।

"नहीं।"

पंडित जी कुछ देर शांत रहे।

फिर बोले,

"कल मुझे उस घर पर ले चलो।"

अगले दिन किशोर अपने पिता और पंडित हरिनारायण झा के साथ घर पहुंचा।

पंडित जी ने घर के हर कमरे को ध्यान से देखा।

जब वे ऊपर वाले पुराने कमरे में पहुंचे तो अचानक रुक गए।

उन्होंने दीवार पर लगे पुराने आईने को देखा।

फिर पूछा,

"यह आईना यहां कब से है?"

किशोर ने कहा,

"पता नहीं। जब हमने घर खरीदा था तब से यहीं था।"

पंडित जी ने कहा,

"इसे हटाना मत। पहले मुझे घर का पुराना इतिहास जानना होगा।"

उन्होंने आसपास के बुजुर्ग लोगों से पूछताछ शुरू की।

तभी वही बुजुर्ग पड़ोसी मिले जिन्होंने किशोर को पहले चेतावनी दी थी।

उन्होंने लंबी सांस ली और कहा,

"मैं जानता था कि यह घर एक दिन फिर किसी को अपने अंदर खींचेगा।"

किशोर ने पूछा,

"आप जानते थे इस घर के बारे में?"

बुजुर्ग बोले,

"बहुत साल पहले यहां एक महिला रहती थी। उसका नाम था माधवी। उसके परिवार के लोग एक-एक करके यह घर छोड़कर चले गए। आखिरी दिनों में वह इसी ऊपर वाले कमरे में अकेली रहती थी।"

"फिर?"

"एक रात उसने कहा था कि घर उसे छोड़ना नहीं चाहता।"

किशोर और उसके पिता एक-दूसरे को देखने लगे।

बुजुर्ग ने आगे कहा,

"उसके बाद वह महिला कहीं दिखाई नहीं दी। लोग कहते हैं कि उसकी आत्मा इस घर में रह गई। लेकिन असली बात कोई नहीं जानता।"

पंडित जी ने शांत आवाज में कहा,

"हर कहानी में कुछ सच होता है और कुछ लोगों की कल्पना। हमें बिना डर फैलाए सच समझना होगा।"

उन्होंने घर में एक विशेष पूजा और शांति अनुष्ठान करने की सलाह दी।

लेकिन उन्होंने एक बात साफ कही,

"इस दौरान सुस्मिता को अकेला मत छोड़ना।"

उस रात पूरा परिवार घर में साथ रहा।

सास ने सुस्मिता के पास बैठकर उसका हाथ पकड़े रखा।

ससुर बाहर कमरे में बैठे रहे।

किशोर भी उसके पास था।

पंडित जी ने पूजा शुरू की।

मंत्रों की आवाज पूरे घर में गूंजने लगी।

कुछ देर बाद अचानक ऊपर वाले कमरे का दरवाजा अपने आप खुल गया।

घर में बैठे सभी लोग शांत हो गए।

सुस्मिता ने अचानक आंखें बंद कर लीं।

उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

फिर उसने कहा,

"वो कह रही है... उसे अकेला छोड़ दिया गया था।"

किशोर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"तुम अकेली नहीं हो। हम सब तुम्हारे साथ हैं।"

सुस्मिता की आंखों से आंसू निकल आए।

पंडित जी ने कहा,

"डर से नहीं, शांति से बात करो।"

किशोर ने ऊपर की तरफ देखते हुए कहा,

"अगर इस घर में किसी की अधूरी पीड़ा है, तो हम उसका सम्मान करते हैं। लेकिन मेरी पत्नी को छोड़ दो। उसे अपने साथ मत बांधो।"

कुछ क्षण तक पूरा घर बिल्कुल शांत रहा।

फिर अचानक ऊपर वाले कमरे से आईने के टूटने जैसी आवाज आई।

सब डर गए।

लेकिन जब वे ऊपर पहुंचे तो आईना टूटा नहीं था।

बस उसके ऊपर जमी पुरानी धूल हटकर बीच में एक शब्द दिखाई दे रहा था।

"मुक्ति"

पंडित हरिनारायण झा ने उसे देखा और कहा,

"शायद यही इस घर की सबसे बड़ी कहानी है।"

उन्होंने अगले दिन एक विशेष शांति पूजा कराने की बात कही।

पूजा के बाद घर का वातावरण धीरे-धीरे बदलने लगा।

सुस्मिता को फिर कभी किसी ने उसका नाम लेकर नहीं बुलाया।

ऊपर का कमरा भी सामान्य हो गया।

कुछ महीनों बाद सुस्मिता ने कहा,

"किशोर, अब मुझे इस घर से डर नहीं लगता।"

किशोर मुस्कुराया।

"मुझे भी नहीं।"

उसकी मां ने कहा,

"घर ईंट-पत्थर से नहीं बनता। घर उन लोगों से बनता है जो एक-दूसरे का साथ देते हैं।"

किशोर ने अपनी मां की तरफ देखा।

उसे उस दिन एहसास हुआ कि अगर उसका परिवार उसका साथ नहीं देता, तो शायद वह इस डर का सामना अकेले नहीं कर पाता।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

लगभग एक साल बाद किशोर ने घर के पुराने कागजात संभालते समय एक पुरानी तस्वीर देखी।

तस्वीर में एक महिला खड़ी थी।

उसके पीछे वही घर था।

वही आंगन।

वही ऊपर वाला कमरा।

और तस्वीर के पीछे सिर्फ एक तारीख लिखी थी।

किशोर ने तारीख देखी और हैरान रह गया।

वह तारीख उस दिन से ठीक सौ साल पुरानी थी, जिस दिन किशोर ने वह घर खरीदा था।

उसने तस्वीर सुस्मिता को दिखाई।

सुस्मिता कुछ देर तक तस्वीर देखती रही।

फिर धीरे से बोली,

"किशोर... इसे संभालकर रखना।"

"क्यों?"

सुस्मिता ने कहा,

"क्योंकि शायद यह डर की कहानी नहीं है। शायद यह किसी ऐसे इंसान की कहानी है जिसे बस कोई सुनने वाला चाहिए था।"

उस दिन के बाद उन्होंने उस पुराने कमरे को बंद नहीं किया।

उन्होंने वहां एक छोटा-सा दीपक जलाना शुरू किया।

न कोई डर था।

न कोई अजीब आवाज।

न कोई रहस्यमय पुकार।

बस एक अजीब-सी शांति।

और आज भी राजगीर के आसपास के कुछ बुजुर्ग उस पुराने मकान की कहानी सुनाते हैं।

वे कहते हैं—

"हर शाप के पीछे सिर्फ डर नहीं होता। कभी-कभी कोई अधूरी कहानी भी होती है। और जब कोई उस कहानी को सुन लेता है, तो शायद शाप भी खत्म हो जाता है।"

और शायद यही वजह थी कि वह घर इतने सस्ते दाम में मिला था।

क्योंकि लोग घर की कीमत जानते थे...

लेकिन उसकी कहानी सुनने के लिए कोई तैयार नहीं था।



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